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मंगलवार, 26 मई 2026

क्या 'वंश' और 'आरक्षण' का आपस में कोई विरोध है?

क्या 'वंश' और 'आरक्षण' का आपस में कोई विरोध है? आइए सच जानते हैं..

अक्सर आलोचक यह सवाल पूछते हैं कि "यदि कुशवाहा भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज हैं, तो फिर OBC में क्यों हैं?

यह सवाल सुनने में तार्किक लग सकता है, लेकिन यह इतिहास और वर्तमान की अधूरी समझ पर आधारित है। इसके जवाब में 3 मुख्य बातें समझनी जरूरी हैं:

1. 'वंश' गौरव का प्रतीक है, 'आरक्षण' अवसर का 👉🏻

कुशवाहा गर्व से कहते हैं कि वे महाराजा कुश के वंशज हैं, यह उनकी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों से जुड़ाव है। लेकिन आरक्षण का आधार 'वंश' नहीं, बल्कि 'सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन' होता है।
आजादी के समय किए गए सर्वे (मंडल कमीशन आदि) में पाया गया कि खेती-किसानी से जुड़ी यह मेहनतकश कौम शिक्षा और सरकारी नौकरियों में पीछे रह गई थी, इसीलिए उन्हें OBC का हक मिला।

2. इतिहास का उतार-चढ़ाव 👉🏻

समय कभी एक जैसा नहीं रहता। इतिहास गवाह है कि कई महान राजवंश समय के चक्र के साथ खेती और पशुपालन जैसे श्रमसाध्य कार्यों में लग गए।
उदाहरण के लिए, मराठा इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज का गौरवशाली साम्राज्य था, लेकिन आज उनकी एक बड़ी आबादी भी आरक्षण की मांग कर रही है क्योंकि आर्थिक और शैक्षणिक हालात बदल चुके हैं। इसी तरह कुशवाहा समाज ने सदियों तक मिट्टी से जुड़कर देश का पेट भरा, जिससे वे मुख्यधारा की राजनीति और सत्ता से दूर होते गए।

3. "आरक्षण" निम्न जाति का सूचक नहीं है 👉🏻

आरक्षण कोई "गरीबी हटाओ योजना" नहीं है, बल्कि "प्रतिनिधित्व" सुनिश्चित करने का तरीका है। यदि कुशवाहा राजा के वंशज होकर भी शासन-प्रशासन की कुर्सी से गायब हैं, तो इसका मतलब है कि उसे कुर्सी तक पहुँचने के लिए 'OBC' जैसे संवैधानिक सहयोग की जरूरत है।

📌 कुशवाहा अपनी जड़ों (भगवान राम और कुश) का सम्मान करते हैं, लेकिन वे वर्तमान की चुनौतियों से भी वाकिफ हैं।
'कुशवाहा' होने का गौरव उनके आत्म सम्मान में है, और 'OBC' का संवैधानिक अधिकार उनके भविष्य के लिए है।
दोनों में कोई विरोधाभास नहीं है।

शनिवार, 23 मई 2026

कछवाहा राजवंश और विरासत

हमारा क्षत्रिय इतिहास हमारी धरोहर
कछवाहा राजवंश और विरासत
🚩 कछवाह(कुशवाह) वंश 🚩
🚩🚩🚩क्षत्रिय सिरदारों आज मैं आपको उस वंश की जानकारी प्राप्त कराना चाहता हूँ जिसका वंश सूर्यवंशी हो , कछवाह, मानव मानव्य गोत्र (राजस्थान में) पहले कश्यप गोत्र था व प्रवर गौतम (उ० प्र० में) वशिष्ठ, वार्हस्पत्य मानव और कुलदेवी जमुआय (दुर्गा - मंगला)/ जमवाय माता ,वेद सामवेद , शाखा कौथुमी (उ० प्र० में) तथा माध्यन्दिनी (राजस्थान में),सूत्र गोभिल,गृहसूत्र , निशान पचरंगा ध्वज (पहले सफ़ेद ध्वज था जिसमे कचनार का वृक्ष था) व नगाड़ा यमुना प्रसाद , नदी सरयू ,छत्र श्वेत ,वृक्ष वट (बड़) ,पक्षी कबूतर ,धनुष सारंग ,घोडा उच्चैश्रव ,ईष्टदेव रामचन्द्र प्रमुख ,गद्दी नरवरगढ़ और जयपुर गायत्री ब्रम्हायज्ञोपवीत , पुरोहित खांथडिया पारीक (राजस्थान में) पहले गंगावत हो , नारा जय भवानी ,राष्ट्र भारत ,क्षेत्र उत्तर भारत, (आर्यावर्त) हो उस वंश का नाम कछवाह(कुशवाह) वंश है जो सूर्यवंशी राजपूतों की एक शाखा है। कुल मिलाकर बासठ वंशों के प्रमाण ग्रन्थों में मिलते हैं। ग्रन्थों के अनुसार कछवाह का कोई अध्यक्ष नहीं है व दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का प्रमाण मिलता है । इन्हीं में से एक क्षत्रिय शाखा कछवाह(कुशवाह) निकली। यह उत्तर भारत के बहुत से क्षेत्रों में फ़ैली हुई है ।

👏 क्षत्रिय सिरदारों इस सांसारिक जीवन में जातियाँ और मनुष्य अपने पूर्वजों के इतिहास से शिक्षा व प्रेरणा लेकर जीवन निर्वाह करते हैं एवं अपने उज्जवल भविष्य का निर्माण स्वविवेक से करते हैं।कछवाहा वंश इतिहास में प्रसिद्ध क्षत्रिय सूर्यवंशी राजपूत राजवंश की एक (खाप) शाखा है कछवाहों (राजपूतों) की इस खाप की उत्पति कहाँ से और कैसे हुई ? मान्यता यह है कि यह कुल राम के पुत्र कुश से उत्पन्न हुआ है।कछवाह वंश अयोध्या राज्य के सूर्यवंशी राजाओ की एक शाखा है। भगवान श्री रामचन्द्र जी के ज्येष्ठ पुत्र कुश से इस वंश (शाखा) का विस्तार हुआ है । अयोध्या राज्य पर कुशवाह वंश का शासन रहा है। अयोध्या राज्य वंश में ''इक्ष्वाकु'' दानी ''हरिशचन्द्र'', ''सगर'' (इनके नाम से सगर द्वीप जहाँ गंगासागर तीर्थ स्थल है), पितृ भक्त ''भागीरथ '', गौ भक्त ''दिलीप '', ''रघु'' सम्राट ''दशरथ'', मर्यादा पुरूषोत्तम भगबान "रामचंद्र" एवं उनके ज्येष्ठ पुत्र महाराज ''कुश'' के वंशधर कुशवाह कहलाये।बिहार में महाराजा कुश के वंशजो की एक शाखा अयोध्या से चलकर साकेत आयी और साकेत से, बिहार मे सोन नदी के किनारे रोहिताशगढ़ (बिहार) आकर वहा रोहताशगढ किला बनाया और मध्यप्रदेश में महाराजा कुश के वंशजो की एक शाखा फिर बिहार के रोहताशगढ से चलकर पदमावती (ग्वालियर) मध्यप्रदेश मे आये। कछवाह वंशज के एक राजकुमार तोरुमार नरवर (तोरनमार) पदमावती (ग्वालियर) मध्यप्रदेश मे आये ।नरवर (ग्वालियर ) के पास का प्रदेश कच्छप प्रदेश कहलाता था और वहा आकर कछवाह वंशज के एक राजकुमार तोरुमार ने एक नागवंशी राजा देवनाग को पराजित कर इस क्षेत्र को अपने कब्जे में किया। क्योकि यहाँ पर कच्छप नामक नागवंशीय क्षत्रियो की शाखा का राज्य था ।नागो का राज्य ग्वालियर के आसपास था । इन नागो की राजधानी पद्मावती थी, पदमावती राज्य पर अपना अधिकार करके सिहोनिया गाँव को अपनी सर्वप्रथम राजधानी बनायी थी । यह मध्यप्रदेश में जिला मुरैना मे पड़ता है व आगे चलकर यह क्षेत्र राजा नल के कारण नरवर क्षेत्र कहलाया। कुशवाह राजाओं में राजा ''नल'' सुविख्यात रहा है, जिसकी वीरगाथा ढोला गायन के मार्फत सुनते आये हैं। समाज का अतीत अत्यधिक वैभवशाली रहा है। मध्यप्रदेश के एक राजा नल-दमयंती का पुत्र ढोला जिसे इतिहास में साल्ह्कुमार के नाम से भी जाना जाता है का विवाह राजस्थान के जांगलू राज्य के पूंगल नामक ठिकाने की राजकुमारी मारवणी से हुआ था जो राजस्थान के साहित्य में ढोला-मारू के नाम से प्रख्यात प्रेमगाथाओं के नायक है। इसी ढोला के पुत्र लक्ष्मण का पुत्र बज्रदामा बड़ा प्रतापी व वीर शासक हुआ जिसने ग्वालियर पर अधिकार कर एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। इसी क्षेत्र मे कछवाहो के वंशज महाराजा सूर्यसेन ने सन् 750 ई. में ग्वालियर का किला बनवाया था। अत: स्पष्ट है कि कछवाहो के पूर्वजो ने आकर कच्छपो से युद्द कर उन्हे हराया और इस क्षेत्र को अपने कब्जे में किया । इसी कारण ये कच्छप, कच्छपघात या कच्छपहा कच्छपरि कहलाने लगे और यही शब्द बिगडकर आगे चलकर कछवाह कहलाने लगा । यहां वर्षो तक कुशवाह का शासन रहा।नरवर (ग्वालियर) राज्य के राजा ईशदेव जी थे और राजा ईशदेव जी के पुत्र सोढदेव के पुत्र, दुल्हराय जी नरवर (ग्वालियर) राज्य के अंतिम राजा थे और राजस्थान में कछवाहा वंश राजस्थानी इतिहास के मंच पर बारहवीं सदी से दिखाई देता है। सोढदेव जी का बेटा दुल्हराय जी जिसका विवाह राजस्थान में मोरागढ़ के शासक रालण सिंह चौहान की पुत्री से हुआ था। रालण सिंह चौहान के राज्य के पड़ौसी दौसा के बड़गुजर राजपूतों ने मोरागढ़ राज्य के करीब पचास गांव दबा लिए थे। अत: उन्हें मुक्त कराने के लिए रालण सिंह चौहान ने दुल्हेराय को सहायतार्थ बुलाया और दोनों की संयुक्त सेना ने दौसा पर आक्रमण कर बड़गुजर शासकों को मार भगाया। दौसा विजय के बाद दौसा का राज्य दुल्हेराय के पास रहा।दौसा का राज्य मिलने के बाद दुल्हेराय ने अपने पिता सोढदेव को नरवर से दौसा बुला लिया और अपने पिता सोढदेव जी को विधिवत दौसा का राज्याभिषेक कर दिया गया। इस प्रकार राजस्थान में दुल्हेराय जी ने सर्वप्रथम दौसा में कछवाह राज्य स्थापित कर अपनी राजधानी सर्वप्रथम दौसा स्थापित की। राजस्थान में कछवाह साम्राज्य की नींव डालने के बाद दुल्हेराय जी ने भांडारेज, मांच, गेटोर, झोटवाड़ा आदि स्थान जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया। दौसा से इन्होने ढूढाड क्षेत्र में मॉच गॉव पर अपना अधिकार किया जहॉ पर मीणा जाति का कब्जा था, मॉच (मॉची) गॉव के पास ही कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बनबाया । कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपने ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी तथा अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी के नाम पर उस मॉच (मॉची) गॉव का नाम बदल कर जमवारामगढ रखा। इस वंश के प्रारम्भिक शासकों में दुल्हराय बडे़ प्रभावशाली थे, जिन्होंने दौसा, रामगढ़, खोह, झोटवाड़ा, गेटोर तथा आमेर को अपने राज्य में सम्मिलित किया था। सोढदेव की मृत्यु व दुल्हेराय के गद्दी पर बैठने की तिथि माघ शुक्ला 7 वि.संवत 1154 है I ज्यादातर इतिहासकार दुल्हेराय जी का राजस्थान में शासन काल वि.संवत 1154 से 1184 के मध्य मानते है Iक्षत्रियों के प्रसिद्ध 36 राजवंशों में कछवाहा वंश के कश्मीर, राजपुताने (राजस्थान) में अलवर, जयपुर,लावा मध्यप्रदेश में ग्वालियर, राज्य थे। मैहर, अमेठी, दार्कोटी आदि इनके अलावा राज्य, उडीसा मे मोरमंज, ढेकनाल, नीलगिरी, बऊद और महिया राज्य कछवाहो के थे। कई राज्य और एक गांव से लेकर पाँच-पाँच सौ ग्राम समुह तक के ठिकानें , जागीरे और जमींदारीयां थी राजपूताने में कछवाहो की 12 कोटडीया और 53 तडे प्रसिद्ध थी आमेर के बाद कछवाहो ने जयपुर शहर बसाया, जयपुर शहर से 7 किमी की दूरी पर कछवाहो का किला आमेर बना है और जयपुर शहर से 32 कि.मी. की दूरी पर ऑधी जाने वाली रोड पर जमवारामगढ है।जमवारामगढ से 5 किमी की दूरी पर कछवाहो की कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बना है । इस मंदिर के अंदर तीन मूर्तियॉ विराजमान है, पहली मूर्ति गाय के बछडे के रूप में विराजमान है, दूसरी मूर्ति श्री जमवाय माता जी की है और तीसरी मूर्ति बुडवाय माता जी की है।इसलिये श्री जमवाय माता जी के बारे में कहा गया है कि ये सतयुग में मंगलाय, त्रेता में हडवाय, द्वापर में बुडवाय तथा कलियुग में जमवाय माता जी के नाम से देवी की पूजा - अर्चना होती आ रही है ।ढुंढ़ाड़ (जयपुर,आमेर राज्य) की यह धरती सदा दिल्ली की रक्षक रही है | इसके बल के भरोसे ही देश हमेशा कृतार्थ व सुरक्षा के प्रति निश्चिन्त रहा है ।स्वाभिमानी कुशवाह क्षत्रिय ने अपने मूल राज्य आमेर व निकट क्षेत्रों से उजड़कर जाजऊ-पार्वती नदी (उत्तरप्रदेश-राजस्थान सीमा) के पास किला बनाकर (वर्तमान जाजऊ की सराय) कुशवाह क्षत्रिय का पुन: एक और समानान्तर राज्य सिथापित किया था। साथ ही साथ वाड़ी व निदारा (धौलपुर) में मिट्टी के बुर्जदार किले रक्षा हेतु बनाए। परन्तु मुगल सेना ने पुन: स्थापित राज्य से सत्ताविहीन कर दिये जाने पर स्वाभिमानी कछवाह राजपूतों ने, पुन: राज्य स्थापित करने का मानस बदलकर निकट व दूर (वर्तमान राजस्थान, उ.प्र., म.प्र, व बिहार प्राप्त) अपना नया ठिकाना बनाया। कछवाह परिवारों का सन्तोष के साथ भरण-पोषण करने लगे, परन्तु जो समाज पहले से ही निवास कर रहा था, उनके पास पर्याप्त जमीन थी। पीढ़ी दर पीढ़ी समाज, गरीबी व अशिक्षा से ग्रसित होता गया। मुगलों से बचाव हेतु अपने को राजपूत कहना त्याग दिया। कुशवाहों की बस्तियों व गाँवों में जागा-भाट समय -समय पर आते रहते हैं और उपरोक्त वंशावली अपनी पोथी से बयान करते हैं। जागा-भाट एवं इतिहासकार समाज का निकास, तत्कालीन राज्य आमेर, ग्वालियर एवं अयोध्या राज्य से बतलाते आ रहे हैं।हमारे बुजर्ग हमेशा से क्षत्रित्व भावना को पीढ़ी दर पीढ़ी बतलाते रहे हैं कि हमारी जाति कुशवाह क्षत्रिय है। और उनमें अपने गौरवशाली वंश प्रतिष्ठा का अहसास हमेशा बना रहा है।वर्तमान में मध्य प्रदेश के ग्वालियर, नरवरगढ़ एवं जाजऊ किलों के निकट व अन्य दूर क्षेत्रों में आज भी सूर्यवंशीं कुशवाह क्षत्रिय समाज की घनी आबादी है। राजस्थान के तत्कालीन आमेर राज्य में (वर्तमान दौसा, अलवर, सवाईमाधोपुर, जयपुर व टोंक जिलो के क्षेत्र) कुशवाह की विशेष बहुलता थी। स्वाभिमानी कछवाहों के उजड़ने के बाद जातीय समीकरण बिगड़ गया, पुन: मीणा जाति का जनाधार वाला क्षेत्र हो गया, इस भय के कारण राजा मानसिंह ने जातीय समीकरण उचित रखने के लिए हरियाणा राज्य से, किसी खेतीहर जाति को आर्थिक, जमीन एवं मकान से सहायता कर विस्थापित किया, और जातीय समीकरण उचित करने का प्रयास किया, परन्तु कछवाह क्षत्रिय की जनसंख्या फिर भी कम ही रही। यह समाज अपने को हरियाणा ब्राह्मण कहता है एवं जयपुर राज-परिवार के स्वामिभक्त होने के साथ-साथ राज-परिवार का गुणगान भी करता है।
दुल्हेराय जी के वंशज जो राजस्थान में कछवाह वंश की उपशाखाओं यथा - राजावत, शेखावत, नरूका, नाथावत, खंगारोत आदि नामों से जाने जाते है आज भी जन्म व विवाह के बाद जमवाय माता जी के जात (मत्था टेकने जाते है) लगाते है I राजस्थान में दौसा के आप-पास बड़गूजर राजपूतों व मीणा शासकों पतन कर उनके राज्य जीतने के बाद दुल्हेराय जी ग्वालियर की सहायतार्थ युद्ध में गए थे जिसे जीतने के बाद वे गंभीर रूप से घायलावस्था में वापस आये और उन्ही घावों की वजह से माघ सुदी 7 वि.संवत 1112 अर्थात 28 जनवरी 1135 ई. को उनका निधन हो गया और उनके पुत्र कांकलदेव खोह की गद्दी पर बैठे जिन्होंने आमेर के मीणा शासक को हराकर आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया जो भारत की आजादी तक उनके वंशज के अधिकार में रहा I

👏 क्षत्रिय सिरदारों कछवाहों की खापें देलनोत ,झामावत ,घेलणोत ,
राल्णोत ,जीवलपोता ,आलणोत (जोगी कछवाहा) , प्रधान कछवाहा , सावंतपोता, खीवाँवात ,
बिकसीपोता,पीलावत ,भोजराजपोता (राधर का,बीकापोता ,गढ़ के कछवाहा,सावतसीपोता) ,
सोमेश्वरपोता,खींवराज पोता,दशरथपोता,
बधवाड़ा,जसरापोता, हम्मीरदे का , भाखरोत, सरवनपोता,नपावत,तुग्या कछवाहा, सुजावत कछवाहा, मेहपाणी , उग्रावत , सीधादे कछवाहा, कुंभाणी , बनवीरपोता,हरजी का कछवाहा,वीरमपोता, मेंगलपोता, कुंभावत, भीमपोता या नरवर के कछवाहा, पिचयानोत , खंगारोत,सुल्तानोत, चतुर्भुज, बलभद्रपोत, प्रताप पोता, नाथावत, बाघावत, देवकरणोत , कल्याणोत, रामसिंहहोत, साईंदासोत, रूप सिंहसोत, पूर्णमलोत , बाकावत , राजावत, जगन्नाथोत, सल्देहीपोता, सादुलपोता, सुंदरदासोत , नरुका, मेलका, शेखावत, करणावत , मोकावत , भिलावत, जितावत, बिझाणी, सांगणी, शिवब्रह्मपोता , पीथलपोता, पातलपोता आदि है व ख्यात अनुसार कछवाहोँ का पीढी क्रम ईस प्रकार से है प्रथम भगवान श्री राम - भगवान श्री राम के बाद कछवाहा (कछवाह) क्षत्रिय राजपूत राजवंश का इतिहास इस प्रकार भगवान श्री राम का जन्म ब्रह्माजी की 67वीँ पिढी मेँ और ब्रह्माजी की 68वीँ पिढी मेँ लव व कुश का जन्म हुआ जो राम जी के पुत्र हुए ।रामायण कालीन महर्षि वाल्मिकी की महान धरा एवं माता सीता के पुत्र लव-कुश का जन्म स्थल कहे जाने वाला धार्मिक स्थल तुरतुरिया है। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्म भूमि माना जाता है।- रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था। राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बड़गूजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने लाहौर की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं। राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा ।तीसरे.अतिथि जो कुश के पुत्र हुये व चौथे वीरसेन (निषध) हुए जो कि निषध देश के एक राजा थे। भारशिव राजाओं में वीरसेन सबसे प्रसिद्ध राजा था। कुषाणों को परास्त करके अश्वमेध यज्ञों का सम्पादन उसी ने किया था। ध्रुवसंधि की दो रानियाँ थीं। पहली पत्नी महारानी मनोरमा कलिंग के राजा वीरसेन की पुत्री थी । वीरसेन (निषध) के एक पुत्री व दो पुत्र हुए थे । प्रथम पुत्र मदनसेन (मदनादित्य) – (निषध देश के राजा वीरसेन का पुत्र) सुकेत के 22 वेँ शासक राजा मदनसेन ने बल्ह के लोहारा नामक स्थान मे सुकेत की राजधानी स्थापित की। राजा मदनसेन के पुत्र हुए कमसेन जिनके नाम पर कामाख्या नगरी का नाम कामावती पुरी रखा गया।दूसरे पुत्र राजा नल - (निषध देश के राजा वीरसेन का पुत्र) निषध देश पुराणानुसार एक देश का प्राचीन नाम जो विन्ध्याचल पर्वत पर स्थित था व मनोरमा (पुत्री) - अयोध्या में भगवान राम से कुछ पीढ़ियों बाद ध्रुवसंधि नामक राजा हुए । उनकी दो स्त्रियां थीं । पट्टमहिषी थी कलिंगराज वीरसेन की पुत्री मनोरमा और छोटी रानी थी उज्जयिनी नरेश युधाजित की पुत्री लीलावती । मनोरमा के पुत्र हुए सुदर्शन और लीलावती के शत्रुजित ।माठर वंश के बाद कलिंग में नल वंश का शासन आरम्भ हो गया था। माठर वंश के बाद500 ई० में नल वंश का शासन आरम्भ हो गया। वर्तमान उड़ीसा राज्य को प्राचीन काल से मध्यकाल तक ओडिशा राज्य , कलिंग, उत्कल, उत्करात, ओड्र, ओद्र, ओड्रदेश, ओड, ओड्रराष्ट्र, त्रिकलिंग, दक्षिण कोशल, कंगोद, तोषाली, छेदि तथा मत्स आदि भी नामों से जाना जाता था। नल वंश के दौरान भगवान विष्णु को अधिक पूजा जाता था इसलिए नल वंश के राजा व विष्णुपूजक स्कन्दवर्मन ने ओडिशा में पोडागोड़ा स्थान पर विष्णुविहार का निर्माण करवाया। नल वंश के बाद विग्रह वंश, मुदगल वंश, शैलोद्भव वंश और भौमकर वंश ने कलिंग पर राज्य किया।पाँचवे राजा नल हुए जो निषध देश के राजा वीरसेन के पुत्र, राजा नल का विवाह विदर्भ देश के राजा भीमसेन की पुत्री दमयंती के साथ हुआ था। नल-दमयंती - विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री दमयंती और निषध के राजा वीरसेन के पुत्र नल राजा नल स्वयं इक्ष्वाकु वंशीय थे। महाकांतार (प्राचीन बस्तर) जिसे मौर्य काल में स्वतंत्र आटविक जनपद क्षेत्र कहा गया इसे समकालीन कतिपय ग्रंथों में महावन भी उल्लेखित किया गया है। महाकांतार (प्राचीन बस्तर) क्षेत्र में अनेक नाम नल से जुडे हुए हैं जैसे - नलमपल्ली, नलगोंडा, नलवाड़, नलपावण्ड, नड़पल्ली, नीलवाया, नेलाकांकेर, नेलचेर, नेलसागर आदि।महाकांतार (प्राचीन बस्तर) क्षेत्र पर नलवंश के राजा व्याघ्रराज (350-400 ई.) की सत्ता का उल्लेख समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशास्ति से मिलता है। व्याघ्रराज के बाद, व्याघ्रराज के पुत्र वाराहराज (400-440 ई.) महाकांतार क्षेत्र के राजा हुए। वाराहराज का शासनकाल वाकाटकों से जूझता हुआ ही गुजरा। राजा नरेन्द्र सेन ने उन्हें अपनी तलवार को म्यान में रखने के कम ही मौके दिये। वाकाटकों ने इसी दौरान नलों पर एक बड़ी विजय हासिल करते हुए महाकांतार का कुछ क्षेत्र अपने अधिकार में ले लिया था। वाराहराज के बाद, वाराहराज के पुत्र भवदत्त वर्मन (400-440 ई.) महाकांतार क्षेत्र के राजा हुए। भवदत्त वर्मन के देहावसान के बाद के पश्चात उसका पुत्र अर्थपति भट्टारक (460-475 ई.) राजसिंहासन पर बैठे। अर्थपति की मृत्यु के पश्चात नलों को कडे संघर्ष से गुजरना पडा जिसकी कमान संभाली उनके भाई स्कंदवर्मन (475-500 ई.) नें जिसे विरासत में सियासत प्राप्त हुई थी। इस समय तक नलों की स्थिति क्षीण होने लगी थी जिसका लाभ उठाते हुए वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन नें पुन: महाकांतार क्षेत्र के बडे हिस्सों पर पाँव जमा लिये। नरेन्द्र सेन के पश्चात उसके पुत्र पृथ्वीषेण द्वितीय (460-480 ई.) नें भी नलों के साथ संघर्ष जारी रखा। अर्थपति भटटारक को नन्दिवर्धन छोडना पडा तथा वह नलों की पुरानी राजधानी पुष्करी लौट आया। स्कंदवर्मन ने शक्ति संचय किया तथा तत्कालीन वाकाटक शासक पृथ्वीषेण द्वितीय को परास्त कर नल शासन में पुन: प्राण प्रतिष्ठा की। स्कंदवर्मन ने नष्ट पुष्करी नगर को पुन: बसाया अल्पकाल में ही जो शक्ति व सामर्थ स्कन्दवर्मन नें एकत्रित कर लिया था उसने वाकाटकों के अस्तित्व को ही लगभग मिटा कर रख दिया । के बाद नल शासन व्यवस्था के आधीन कई माण्डलिक राजा थे। उनके पुत्र पृथ्वीव्याघ्र (740-765 ई.) नें राज्य विस्तार करते हुए नेल्लोर क्षेत्र के तटीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था। यह उल्लेख मिलता है कि उन्होंनें अपने समय में अश्वमेध यज्ञ भी किया। पृथ्वीव्याघ्र के पश्चात के शासक कौन थे इस पर अभी इतिहास का मौन नहीं टूट सका है। नल-दम्यंति के पुत्र-पुत्री इन्द्रसेना व इन्द्रसेन थे।ब्रह्माजी की 71वीँ पिढी मेँ जन्में राजा नल से इतिहास में प्रसिद्ध क्षत्रिय सूर्यवंशी राजपूतों की एक अलग शाखा चली जो कछवाह के नाम से विख्यात है व छठे राजा नल-दमयंती का पुत्र ढोला जिसे इतिहास में साल्ह्कुमार के नाम से भी जाना जाता है का विवाह राजस्थान के जांगलू राज्य के पूंगल नामक ठिकाने की राजकुमारी मारवणी से हुआ था। जो राजस्थान के साहित्य में ढोला-मारू के नाम से प्रख्यात प्रेमगाथाओं के नायक है व सातवे ढोला के लक्ष्मण नामक पुत्र हुए व आठवे लक्ष्मण के भानु नामक पुत्र व नवे भानु के बज्रदामा नामक पुत्र हुए व भानु के पुत्र परम प्रतापी महाराजा धिराज बज्र्दामा हुवा जिस ने खोई हुई कछवाह राज्यलक्ष्मी का पुनः उद्धारकर ग्वालियर दुर्ग प्रतिहारों से पुनः जीत लिया व दसवे बज्रदामा के मंगल राज नामक पुत्र हुआ। बज्र्दामा के पुत्र मंगल राज हुवा जिसने पंजाब के मैदान में महमूद गजनवी के विरुद्ध उतरी भारत के राजाओं के संघ के साथ युद्ध कर अपनी वीरता प्रदर्शित की थी। मंगल राज के दो पुत्र हुए । पहला किर्तिराज (बड़ा पुत्र) जिसको ग्वालियर का राज्य मिला था व दूसरा सुमित्र (छोटा पुत्र) जिसको नरवर का राज्य मिला था। नरवर किला, शिवपुरी के बाहरी इलाके में शहर से 42 किमी. की दूरी पर स्थित है जो काली नदी के पूर्व में स्थित है। नरवर शहर का ऐतिहासिक महत्व भी है और इसे 12 वीं सदी तक नालापुरा के नाम से जाना जाता था। इस महल का नाम राजा नल के नाम पर रखा गया है जिनके और दमयंती की प्रेमगाथाएं महाकाव्य महाभारत में पढ़ने को मिलती हैं। इस नरवर राज्य को ‘निषध राज्य भी कहते थे, जहां राजा वीरसेन का शासन था। उनके ही पुत्र का नाम राजा नल था। राजा नल का विवाह दमयंती से हुआ था। बाद में चौपड़ के खेल में राजा नल ने अपनी सत्ता को ही दांव पर लगा दिया था और सब कुछ हार गए। इसके बाद उन्हें अपना राज्य छोड़कर निषाद देश से जाना पड़ा था। 12वीं शताब्दी के बाद नरवर पर क्रमश: कछवाहा, परिहार और तोमर राजपूतों का अधिकार रहा, जिसके बाद 16वीं शताब्दी में मुग़लों ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया। मानसिंह तोमर (1486-1516 ई.) और मृगनयनी की प्रसिद्ध प्रेम कथा से नरवर का सम्बन्ध बताया जाता है।ग्यारहवाँ मंगल राज का छोटा पुत्र सुमित्र था व बारहवा
सुमित्र के ईशदेव नामक पुत्र हुआ। तेहरवे इश्वरदास (ईशदेव जी) 966 – 1006 ग्वालियर (मध्य प्रदेश) के शासक बने व इश्वरदास (ईशदेव जी) के सोढ देव (सोरा सिंह) नामक पुत्र हुआ व चौदवे सोढदेव जी के दुलहराय जी (ढोलाराय) नामक पुत्र हुआ दुलहराय जी (ढोलाराय) (1006-36) आमेर (जयपुर) के शासक हुए जिनके तीन पुत्र कॉकिलदेव जो कॉकिलदेव (काँखल जी, कांकल देव) 1036-38) आमेर (जयपुर) के शासक थे व दूसरे डेलण जी, व त्तीसरे वीकलदेव जी हुये व पन्द्रहवे कॉकिलदेव (काँखल जी, कांकल देव) हुए जिनका संमय (1036-38) आमेर (जयपुर) के शासक थे। कॉकिलदेव (काँखल जी, कांकल देव) के पांच पुत्र अलघराय जी , गेलन जी , रालण जी , डेलण ज हुन देव जी हुए व सौलहवे कांकल देव (काँखल देव) के हुन देव नामक पुत्र हुआ जो 1038-53तक आमेर (जयपुर) के शासक थे व सत्रहवें हुन देव के जान्ददेव नामक पुत्र हुआ। जिनका संमय 1053 से 1070 ईस्वी तक आमेर (जयपुर) के शासक रहे । अठारहवे जान्ददेव के पंञ्जावन (पुजना देव, पाजून, पज्जूणा) नामक पुत्र हुआ।पंञ्जावन (पुजना देव,पाजून, पज्जूणा) (1070 – 1084) आमेर (जयपुर) के शासक रहे व उन्नीसवें राजा मलैसिंह देव पंञ्जावन (पुंजदेव, पुजना देव, पाजून, पज्जूणा) का पुत्र था, तथा मलैसिंह दौसा का सातवाँ राजा था मलैसी देव दौसा के बाद राजा मलैसिंह देव 1084 से 1146 तक आमेर (जयपुर) के शासक थे। भारतीय ईतीहास में मलैसी को मलैसी, मलैसीजी, मलैसिंहजी आदी नामों से भी जाना एंव पहचाना जाता है, मगर इन का असली नाम मलैसी देव था। जैसा कि सभी को मालुम है सुंन्दरता के वंश में होकर (मलैसीजी मलैसिंहजी) ने बहुतसी शादीयाँ करी थी। जिन में राजपूत खानदान से बाहर अन्य खानदान एंव अन्य जातीयों में करी थी इन सब की जानकारी बही भाटों की बही एंव समाज के बुजुर्गो की जुबान तो खुलकर बताती है मगर इतिहास के पन्ने इस विषय पर मौन हैं।मलैसी देव के बहुत से पुत्र थे मगर हमें इनमें से सात का तो हर जगह ब्योरा मिल जाता है बाकी पर इतीहास अपनी चुपी नहीं तोड़ता है । मगर हम जागा और जातीगत ईतीहास लिखने वाले बही-भीटों की बही के प्रमाण एंव समाज के बुजुर्गो की जुबान पर जायें तो पता चलता है राजा मलैसी देव कि सन्तानोँ मेँ शुद् रजपुती खुन दो पुत्रोँ मेँ था राव बयालजी (बालोजी) व जैतलजी में। राव बयालजी (बालोजी) व जैतलजी के अलावा बकी पाँच ने कसी कारण वंश दूसरी जाती की लड़की से शादी की जीससे एक अलग- अलग जातीयाँ निकली। मलैसी देव ने राजपूत खानदान से बाहर अन्य खानदान एंव अन्य जातीयों में शादीयाँ करी थी इन सब अन्य जातीयों से पुत्र तोलाजी - टाक दर्जी छींपा , बाघाजी - रावत बनिया ,भाण जी - डाई गुजर , नरसी जी - निठारवाल जाट, रतना जी - सोली सुनार,आमेरा नाई उप