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गुरुवार, 18 सितंबर 2025

असम का कलिता समाज

असम के कलिता समाज की उत्पत्ति, धार्मिक-सांस्कृतिक विकास, गौतम बुद्ध और सम्राट अशोक से संबंध, और आज की स्थिति आदि इस लेख में सब शामिल है। इस लेख में प्रयास किया है कि कलिता समाज की पुरानी, मध्यकालीन और आधुनिक समय में कुशवाहा, सैनी, मौर्य, शाक्य तथागत गौतम बुद्ध एवं सम्राट अशोक से क्या रिश्ता है।

कलिता समाज : वंशावली, ऐतिहासिक विकास और बौद्ध-अशोक परंपरा से संबंध

प्रस्तावना

असम का इतिहास विविध सांस्कृतिक धाराओं का संगम है। यहाँ आर्य और अनार्य, तिब्बती-बर्मी और द्रविड़, सभी जाति-समुदायों ने मिलकर एक बहुरंगी सांस्कृतिक परंपरा बनाई। इन विविध समुदायों में कलिता समाज का विशेष स्थान है। कलिता स्वयं को क्षत्रिय वंशज मानते हैं और अपनी परंपरा को प्राचीन आर्य-क्षत्रिय धारा, बुद्ध के शाक्य वंश और मौर्यकालीन धार्मिक प्रसार से जोड़ते हैं।

यह लेख कलिता समाज की वंशावली, उनके ऐतिहासिक विकास और धार्मिक-सांस्कृतिक योगदान का गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है।

1. कलिता समाज की उत्पत्ति

ऐतिहासिक दृष्टिकोण

"कलिता" शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के "कली" या "कुलीन" से मानी जाती है, जिसका अर्थ है—श्रेष्ठ वंश या उच्च जाति।

प्राचीन साहित्य और असम के शिलालेखों में कलिता समाज को क्षत्रिय अथवा आर्य वंशज कहा गया है।

इतिहासकार मानते हैं कि जब मगध और कौशल क्षेत्र के क्षत्रिय-वंशज पूर्व की ओर बढ़े, तब कुछ समूह असम क्षेत्र में बस गए।

यही समूह बाद में कलिता समाज कहलाया।

पुराण और दंतकथा

स्थानीय परंपराओं में कहा जाता है कि कलिता लोग महाभारत कालीन क्षत्रियों की संतान हैं, जो असम की धरती पर आए और यहाँ स्थायी रूप से बस गए।

कुछ परंपराएँ इन्हें कामरूप (प्राचीन असम) के मूल निवासी भी मानती हैं, जिन्हें वैदिक आर्य संस्कृति ने प्रभावित किया।

2. कलिता और गौतम बुद्ध से संबंध

शाक्य क्षत्रिय वंश

कलिता समाज अपनी वंशावली को गौतम बुद्ध के शाक्य क्षत्रिय वंश से जोड़ता है।

गौतम बुद्ध (6वीं सदी ई.पू.) कपिलवस्तु के शाक्य वंश के राजकुमार थे।

जब शाक्यों का पतन हुआ, तब उनके वंशज विभिन्न दिशाओं में फैल गए।

असम में आए कुछ शाक्य-वंशजों ने स्थानीय समाज से मेल कर कलिता जाति का रूप लिया—यह एक प्रबल धारणा है।

बौद्ध धर्म और कलिता

मौर्यकालीन प्रचारकों के माध्यम से असम में बौद्ध धर्म पहुँचा।

कलिता समाज, जो आर्य क्षत्रिय मूल का था, ने प्रारंभिक दौर में बौद्ध धर्म को अपनाया और उसके संरक्षण में योगदान दिया।

असम के कुछ प्राचीन स्तूप और बौद्ध अवशेष इस संबंध की गवाही देते हैं।

3. कलिता और सम्राट अशोक

अशोक के धर्मदूत और असम

अशोक (3री सदी ई.पू.) ने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म को अपनाया और उसके प्रसार के लिए अपने धर्मदूतों को भारत के विभिन्न हिस्सों में भेजा।

उनके अभिलेखों में चोल, पांड्य और अन्य दक्षिणी राज्यों का उल्लेख है, परंतु पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि पूर्वोत्तर भारत (विशेषकर कामरूप) में भी धर्मदूत भेजे गए।

बौद्ध धर्म की धारा असम पहुँची और कलिता समाज के माध्यम से वहाँ फैली।

कलिता पर प्रभाव

कलिता समाज ने बौद्ध धर्म को स्थानीय परंपराओं से मिलाकर आत्मसात किया।

इस प्रक्रिया में अशोक की धर्मनीति (अहिंसा, करुणा, सहिष्णुता) की छाप स्पष्ट रूप से दिखी।

इसलिए कहा जा सकता है कि कलिता समाज और अशोक का संबंध प्रत्यक्ष राजनीतिक न होकर धार्मिक-सांस्कृतिक संपर्क के रूप में था।

4. मध्यकालीन विकास

हिंदूकरण और वैष्णव आंदोलन

12वीं–15वीं सदी तक असम में वैष्णव धर्म का प्रसार हुआ।

संत शंकरदेव ने भक्ति आंदोलन के जरिए एक नई धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना जगाई।

कलिता समाज इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुआ और वैष्णव परंपरा के प्रमुख वाहक बने।

इस काल में कलिता समाज ने अपनी पहचान उच्च जाति हिंदू (क्षत्रिय/ब्राह्मण-समान) रूप में स्थापित की।

सांस्कृतिक योगदान

साहित्य, संगीत, नाटक (अंकिया नाट), और नामघर परंपरा में कलिता समाज का विशेष योगदान रहा।

असमिया भाषा और संस्कृति के संवर्धन में इस समाज की भूमिका निर्णायक रही।

5. आधुनिक काल में कलिता समाज

राजनीतिक स्थिति

असम की राजनीति में कलिता समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

यह समुदाय प्रशासनिक सेवाओं, शिक्षा और साहित्य में अग्रणी रहा है।

भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने कलिता नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया है।

असम आंदोलन (1979–85) और क्षेत्रीय दलों (असम गण परिषद) में भी इस समाज के नेता सक्रिय रहे।

आर्थिक स्थिति

शिक्षा और सरकारी नौकरियों में कलिता समाज अपेक्षाकृत उन्नत है।

व्यापार, कृषि और सेवाओं में भी इस समुदाय की मजबूत उपस्थिति है।

असम के अन्य पिछड़े समुदायों की तुलना में कलिता की आर्थिक स्थिति बेहतर मानी जाती है।

सामाजिक स्थिति

कलिता समाज को असम में परंपरागत "सवर्ण" समाज माना जाता है।

सामाजिक दृष्टि से इनकी उच्च प्रतिष्ठा है, और अन्य पिछड़े वर्गों से इनकी भिन्न पहचान है।

सांस्कृतिक स्थिति

असम की साहित्य, कला, संगीत और नृत्य परंपरा में कलिता समाज का योगदान उल्लेखनीय है।

भक्ति आंदोलन की धारा आज भी उनके सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है।

अपनी क्षत्रिय और आर्य परंपरा का गौरव अब भी सामाजिक चेतना में जीवित है।

6. वंशावली और गौरव परंपरा

कलिता समाज अपने को प्राचीन क्षत्रिय वंश का उत्तराधिकारी मानता है।

उनकी वंशावली गौतम बुद्ध और शाक्य वंश से जोड़ी जाती है।

अशोक की धर्मधारा ने इन्हें प्रभावित किया और बौद्ध परंपरा ने इनके धार्मिक जीवन को आकार दिया।

बाद में वैष्णव धर्म में समाहित होकर इन्होंने असम की सांस्कृतिक पहचान गढ़ी।

निष्कर्ष

कलिता समाज का इतिहास असम के इतिहास का अभिन्न अंग है।

इसकी उत्पत्ति प्राचीन क्षत्रिय धारा से हुई।

गौतम बुद्ध के शाक्य वंश और मौर्यकालीन बौद्ध प्रसार से इसका सांस्कृतिक संबंध जुड़ा।

अशोक की धर्मनीति और बौद्ध दूतों की गतिविधियों ने इसे गहराई से प्रभावित किया।

मध्यकाल में वैष्णव आंदोलन के तहत यह समाज असम की संस्कृति का वाहक बना।

आधुनिक काल में यह समुदाय शिक्षा, राजनीति और समाज में प्रमुख भूमिका निभा रहा है।

इस प्रकार कलिता समाज न केवल अपनी वंशावली से गौरव प्राप्त करता है, बल्कि आज भी असम की सांस्कृतिक और सामाजिक धारा का एक सशक्त आधार है।

सोमवार, 25 अगस्त 2025

भविष्य पुराण में कुशवाहा जाति का उल्लेख

*भविष्य पुराण में कुशवाहा जाति का उल्लेख 
भविष्य पुराण में लिखा हैः-
कच्छवाही कुशावाही कच्छीनाम युतांस्तथा । एतेहि क्षत्रियाः शुद्धाः शुद्धाचार परायणाः ।
अर्थः-कच्छवाही कुशावाही और काच्छी नाम युक्त जातियें शुद्ध क्षत्रिय हैं और शुद्धाचार परयण हैं इसका भावार्थ यह है कि कुश से चला हुआ वंश गुजरात प्रान्त में कच्छी च राजपूताना युक्त प्रदेश व विहार आदि आदि देशों में काछी कहाता है जो शुद्ध क्षत्रिय वंशज व आचार विचार युक्त सदाचार परायण हैं।

*भविष्य पुराण में कुशवाहा जाति का उल्लेख 
कच्छुवाहारी कुषवाहाचारी कच्छीनाम युतास्तथा।
प्राचीये लूनियाः शुद्धाः शुद्धाचार परायणाः ॥
 यह संदर्भ "भविष्य पुराण" (प्रत्येकाख्यान भाग) से लिया गया है।
इसमें विभिन्न जातियों, कुलों और उनके प्रादेशिक निवास का उल्लेख मिलता है।
🔹 श्लोक में “कच्छुवाहारी”, “कुशवाहाचारी” तथा “कच्छी” नाम से संबद्ध जातियों का वर्णन है।
🔹 “प्राचीये लूनियाः शुद्धाः” से तात्पर्य पूर्व दिशा (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश) में रहने वाले लोग हैं।
🔹 यहाँ जातीय पहचान और उनके आचरण का उल्लेख वर्णनात्मक शैली में मिलता है।

सोमवार, 21 जुलाई 2025

बलदेव सिंह कछवाहा

बलदेव सिंह कछवाहा, कछवाहा राजवंश के एक प्रसिद्ध योद्धा और शासक थे। वे आमेर के राजा पृथ्वीराज सिंह प्रथम के पुत्र थे और उन्होंने अपने पिता के शासनकाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 
जन्म और प्रारंभिक जीवन:
बलदेव सिंह का जन्म आमेर के कछवाहा राजवंश में हुआ था। उनके पिता राजा पृथ्वीराज सिंह प्रथम थे, जो आमेर के शासक थे। 
सैन्य जीवन:
बलदेव सिंह एक कुशल योद्धा और सेनापति थे। उन्होंने अपने पिता के शासनकाल में कई युद्धों में भाग लिया और अपनी वीरता का प्रदर्शन किया। 
विवाह और परिवार:
बलदेव सिंह का विवाह राजा पृथ्वीराज चौहान की एक चचेरी बहन से हुआ था। 
अन्य जानकारी:
बलदेव सिंह को अपने जीवन में 64 युद्ध लड़ने का श्रेय दिया जाता है, और तराइन के युद्ध से पहले उनकी मृत्यु हो गई थी।

बुधवार, 9 जुलाई 2025

राजा मान सिंह

[7/8, 21:02] +91 82335 26626: ● राजा मान सिंह ने उड़ीसा में जगन्नाथ मंदिर समेत 7000 मंदिरों से ज़्यादा मंदिरों की रक्षा की ।

● राजा मान ने हिंदुओं का मुक्ति स्थल गयाजी की न केवल रक्षा की, बल्कि वहां कई मंदिर बनवाये भी ।

●राजा मान ने एशिया की सबसे बड़ी शक्ति अफगान मूलवंश बंगाल सल्तनत का नाश किया

● राजा मान ने गुजरात को 300 साल बाद अफगान शासकों से आजादी दिलवाई

● राजा मान ने द्वारिकाधीश मंदिर को मस्जिद से पुनः मंदिर बनाया

● तुलसीदास का सरंक्षक राजा मान था । उन्ही के संरक्षण के कारण तुलसीदास रामायण लिखने में सफल हो पाए ।

● राजा मान ने काशी में हजारो मंदिरो का निर्माण करवाया

● राजा मान ने मीराबाई को पूरा सम्मान दिया, उनका भव्य मंदिर अपने ही राज्य में बनवाया

● राजा मान ने अफगानिस्तान को तबाह करके रख दिया, जहां से पिछले 500 वर्षों से आक्रमण हो रहे थे ।

● राजा मान ने ही पूर्वी UP से लेकर बिहार, झारखंड की रक्षा की

● राजा मान ने ही सोमनाथ मंदिर का दुबारा उद्धार किया था, हालांकि बाद में औरंगजेब ने इसे तोड़ डाला

●राजा मान ने ही हिंदुओ पर लगा हुआ 300 वर्ष से चल रहा जजिया कर हटवाया

● राजा मान ने ही मथुरा का उद्धार किया ।।

● राजा मान की प्रजा ही सबसे सुखी सुरक्षित और सम्पन्न प्रजा थी ।।

लेकिन राजा मान के सम्मान में सबके मुँह में दही जम जाता है, क्यो की उन्होंने इतना काम किया, की पिछले 500 वर्षों में उनके जोड़ का योद्धा ओर धर्मरक्षक आज तक पैदा नही हुआ ।।

लेकिन जब मैने मानसिंह की तारीफ शुरू की, तो एक सज्जन आकर बोलने लगे, राजा मानसिंह के कारण हम अपने सभी राजाओ का सम्मान दाव पर नही लगा सकते, तो इसका अच्छा अर्थ मुझे समझ आया, सबका सम्मान बचाने के लिए राजा मानसिंह को बलि का बकरा बना दो, ओर उनका अपमान करो ? उनके अपमान से सबकी कमियां ढक जाएगी ...

जबकि हक़ीक़त यह है, की 1576 ईस्वी तक, जो हल्दीघाटी युद्धकाल समय था, उस समय तक मुगल तो मुट्ठीभर थे, भारत मे अफगान वंश के मुस्लिम कब्जा करके बैठे थे । मुगल तो यहां 100 साल भी ढंग से राज नही कर पाए ....

इतिहास का विश्लेषण कीजिये, ऐसा न हो कहीं हम कर्नल टॉड ओर चाटुकार इतिहासकारो का इतिहास पढ़कर भारत के वीर पुत्रो का अपमान कर रहे हो............
[7/8, 21:04] +91 82335 26626: अफगानिस्तान के जिन कबीलों को वर्तमान विश्व महाशक्ति अमेरिका और सोवियत रूस अपने अत्याधुनिक हथियारों के बल पर हराना तो दूर, झुका तक नहीं सके, उन्हीं अफगानिस्तान के शासकों, कबीलों को आमेर के Raja Man Singh ने नाकों चने चबवा दिए थे|


सन 1585 में काबुल के शासक मिर्जा हकीम को युद्ध में परास्त करने के बाद राजा मानसिंह ने खैबर दर्रे और राजमार्गों को लूटने वाले दुर्दान्त अफगान कबीलों को कुचल कर अफगानिस्तान में शांति की स्थापना की| अफगानिस्तान बर्फ के पहाड़ों से घिरा हुआ है और राजस्थान जैसे गर्म प्रदेश में रहने वाले सैनिकों के बलबूते राजा मानसिंह ने मौसम की प्रतिकूल परिस्थितयों के बाद भी उस क्षेत्र के पठानों को कुचल कर उनके शस्त्र बनाने वाले कारखाने नेस्तानाबूद किये| इन्हीं शस्त्र कारखानों से भारत के आक्रमणकारियों को हथियार मिलते थे| विदेशी आक्रमणकारी इन्हीं हथियारों के बल पर भारत को लूटने के साथ यहाँ जबरन धर्म-परिवर्तन कराते थे| यदि मानसिंह ने इन्हें नेस्तानाबूद नहीं किया होता तो आज भारत का भी इस्लामीकरण हो चुका होता|

अफगान के जिन कबीलों को महाशक्ति अमेरिका काबू नहीं रख सकी, उन्हें मौसम की विपरीत परिस्थितियों में काबू करने वाले राजा मानसिंह के शौर्य के पैमाने की कल्पना कर सकते है कि उनकी वीरता और साहस कितने उच्च दर्जे का था|
उस ज़माने में राजा मानसिंह एक मात्र ऐसे सेनापति थे जो बर्फीली पहाड़ियों, घनघोर जंगलों, पहाड़ों और जल युद्ध में दक्षता रखते थे| राजा मानसिंह ने पंजाब, अफगानिस्तान, उड़ीसा, बिहार, बंगाल आदि कई क्षेत्रों में सफल सैन्य अभियान चलाये और वहां सफलता प्राप्त की| राणा प्रताप जैसे उच्च श्रेणी के वीर को भी हल्दीघाटी युद्ध में मानसिंह के आगे मैदान छोड़ना पड़ा| जबकि इतिहास साक्षी है हल्दीघाटी युद्ध के बाद मुग़ल सेना महाराणा प्रताप का बाल भी बांका ना कर सकी और हर मुटभेड़ में हारने के बाद मुग़ल सेना दिवेर युद्ध में महाराणा के सामने बुरी तरह हार कर भागी| स्वयं अकबर भी मेवाड़ से असफल होकर वापस लौटा था|

अपने जीवन में 123 युद्ध जिसमें 77 बड़े युद्ध लड़कर जीतने वाले राजा मानसिंह ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में विजय पाने के बाद अपने पूर्वज श्रीराम का अनुसरण करते हुए लंका पर चढ़ाई कर उसे विजय करने का विचार किया और लंका विजय की योजना बनाने का कार्य आरम्भ किया| राजा मानसिंह की लंका विजय की योजना के बारे में एक चारण कवि को पता चला तो उसने राजा मानसिंह के इस अभियान को रोकने के लिए एक सौरठे की रचना कर राजा मानसिंह को सुनाया-

रघुपति दीन्हों दान, विप्र विभीषण जानके|
मान महिपत मान, दियौ दान मत लीजै||


अर्थात्- भगवान राम ने विभीषण को ब्राह्मण जानकर लंका दान में दी थी| अत: हे राजा मान ! उनका दिया दान वापस मत लो|
कवि का उक्त सौरठा सुनने के बाद राजा मानसिंह ने लंका विजय का अपना अभियान रोक दिया|

बुधवार, 21 मई 2025

कुशवाहा समाज की खापें

मित्र आप भ्रमित नहीं हैं आप पूर्ण रूप से अनजान हैं अपने इतिहास से कच्छवाहा/कुशवाहा के बहुत सारी खापें हैं 👇
कछवाहों की खापें
(संकलन- घनश्यामसिंह राजवी चंगोई)

 

डेलनोत 

आमेर के पहले राजा दुल्हे राय के दूसरे पुत्र "डेलन" के वंशज, डेलनोत के नाम से जाने जाते हैं। लहर उनका मुख्य ठिकाना था।

 

बीकलपोता 

आमेर के राजा दुल्हेराय के तीसरे पुत्र "बिकल" के वंशज। एमपी के भिंड और यूपी के जालों गए।

 

घेलनोत 

आमेर के दूसरे राजा कांकिल देव के पुत्र घेलन के वंशज। ग्वालियर, रामपुरा और उड़ीसा गए। 

 

रालनोत 

आमेर के राजा कांकिल देव के पुत्र रालन के वंशज। नैंणसी के समय मनोहरपुर में रहते थे।

 

डेलनपोता 

आमेर के राजा कांकिल देव के चौथे पुत्र "डेलन" के वंशज, ग्वालियर गया।

 

झामावत 

आमेर के राजा कांकिल देव के पोते और अलाघराई के पुत्र "झामा" के वंशज। मेड और कुंडल उनके मुख्य ठिकाना थे।

 

प्रधान कछावा

आमेर के राजा पजवन देव के पुत्र भींवसी और लखनसी के वंशज,  प्रधान के रूप में जाने जाते हैं।

 

जीतलपोता 

आमेर के राजा मलयसी देव के पुत्र जीतल के वंशज।

 

तलचीर का कछावाहा

आमेर के राजा बिजल देव के पुत्र बाघा, भोला और नारो के वंशज। उड़ीसा के कटक गए और नया राज्य पाया।

 

सावंतपोता 

आमेर के राजा राजदेव के पुत्र सावत के वंशज।

 

सियापोता 

आमेर के राजा राजदेव के पुत्र "सिहा" के वंशज।

 

बीकसीपोता 

आमेर के राजा राजदेव के पुत्र "बिकसी" के वंशज। उनके कई "खानप" (उप उप-वंश) हैं

 

पिलावत

आमेर के राजा राजदेव के पुत्र "पीला" के वंशज।

 

भोजराजपोता  

आमेर के राजा राजदेव के पुत्र "भोजराज" के वंशज भोजराजपोता के नाम से जाने जाते हैं, राधारका उनके खाप में से एक हैं। बीकापोता , गढ़ का, संवत्सिपोता अन्य खाप (शाखाएं) हैं

 

बीकमपोता 

आमेर के राजा राजदेव के पुत्र विक्रमसी के वंशज।

 

खिवावत

आमेर के राजा राजदेव के पोते और पाल के पुत्र खिवराज के वंशज।

 

दशरथपोता 

आमेर के राजा राजदेव के परपोते "दशरथ" के वंशज।

 

खिवराजपोता 

आमेर के राजा किल्हन देव के पुत्र "खिवराज" के वंशज।

 

सोमेश्वरपोता 

आमेर के राजा किल्हन देव के पुत्र "सोमेश्वर" के वंशज। राणावत, बाघावत, चित्तौड़िका आदि अन्य खाप हैं।

 

जसराजपोता 

आमेर के राजा किल्हन देव के पुत्र "जसराज" के वंशज।

 

आलनोत  (जोगी कछावा)

आमेर के राजा कुंतल देव के पुत्र आलन के वंशज।

 

आलनोत  (जोगी कछावा)

आमेर के राजा कुंतल देव के पुत्र आलन के वंशज।

 

हम्मीरदे का

आमेर के राजा कुंतल देव के पुत्र "हम्मीर देव" के वंशज।

 

महपाणी 

आमेर के राजा कुंतल देव के पुत्र "नपा" या महपा के वंशज।

 

सरवनपोता 

आमेर के कुंतल देव के पुत्र "सरवन" के वंशज।

 

नपावत

आमेर के राजा कुंतल देव के पुत्र "जीतमल" के वंशज, नपा जीतमल के वंशजों में से थे।

 

तुंग्या कछावा

आमेर के राजा कुंतल देव के पुत्र तुंग्या के वंशज।

 

सुजावत 

आमेर के राजा कुंतल देव के पुत्र "सुजा" के वंशज।

 

बधवाड़ा

आमेर के राजा कुंतल देव के पोते "बधावा" के वंशज।

 

भाखरोत 

आमेर के राजा कुंतल देव के पोते और भदासी के पुत्र "भाखर" के वंशज।

 

धीरावत

आमेर के राजा कुंतल देव के पोते और खिवराज के पुत्र "धीरो" के वंशज।

 

उग्रावत

आमेर के राजा जुणसी देव के पुत्र जसकरण के वंशज "उगरा" के वंशज।

 

सिंघडे

आमेर के राजा जुणसी देव के चौथे पुत्र "सिंह" जी के वंशज।

 

कुंभानी

आमेर के राजा जुणसी देव के तीसरे पुत्र "कुंभाजी” के वंशज, । 

 

नरुका

आमेर के राजा उदयकरण के ज्येष्ठ पुत्र मौजमाबाद के राव बरसिंह के पोते व राव मेराज के पुत्र राव "नरू" के वंशज । दासावत, लालावत, रतनावत इनके खाप हैं।

 

मेलका 

आमेर के राजा उदयकरण के ज्येष्ठ पुत्र मौजमाबाद के राव बरसिंह देव के पुत्र सावंत सिंह के पौत्र मेलक के वंशज। सीकर के पास दूजोद ठिकाना है। 

 

श्योब्रम्हपोता 

आमेर के राजा उदयकरण के चौथे पुत्र "शिवब्रम्ह" के वंशज।

 

पातलपोता 

आमेर के राजा उदयकरण के पांचवें पुत्र "पातल" के वंशज।

 

पीथलपोता 

आमेर के राजा उदयकरण के छठे पुत्र "पीथल" के वंशज।

 

समोद का कछावा

आमेर के राजा उदयकरण के सातवें पुत्र "नपा" के वंशज।

 

बालापोता 

बरवाड़ा के राव बालाजी के पुत्र "खिवराज", "गोविंद दास" और "नाथ" के वंशज। उन्होंने शेखाजी के साथ संघर्ष के दौरान राजा चंद्रसेन का समर्थन किया।

 

मोकावत

बरवाड़ा के राव बाला जी के पुत्र "मोका" के वंशज।

 

कर्णावत 

बरवाड़ा के राव बाला जी के पुत्र "खरतजी" के वंशज।

 

भिलावत

बरवाड़ा के राव बाला जी के पुत्र "भीला" के वंशज।

 

बिंझानी

बरवाड़ा के राव बाला जी के पुत्र "बिंझा" के वंशज।

 

सांगानी

बरवाड़ा के राव बाला जी के पुत्र "सांगा" के वंशज।

 

जीतावत

बरवाड़ा के राव बाला जी के पोते और डूंगर सिंह के पुत्र "जीता" के वंशज।

 

शेखावत

अमरसर के "राव शेखा" जी के वंशज। शेखा जी राव मोकल जी के पुत्र और राव बालो जी के पौत्र थे, जो आमेर के राजा उदयकरण के तीसरे पुत्र थे। टकनेत, लाडखानी , रावजिका, भोजराजिका, गिरधरजिका, हरिरामजिका, अचलदासजीका, उग्रसेनजिका, भैरूंजीका, गोपालजीका, रतनावत, खेजड़ोलिया आदि इनके खाप हैं।

 

बनवीरपोता 

आमेर के राजा बनवीर के छोटे पुत्रों के वंशज। बारह कोटड़ियोंमें से एक। बीरमपोता, मेंगलपोता, हरजिका इनके खाप हैं।

 

कुंभावत

आमेर के राजा चंद्रसेन के पुत्र "कुंभा" के वंशज। जयपुर की बारह कोटडीयों में से एक। ठिकाना- महार, अमरपुरा आदि। 

 

भीमपोता (नरवर कछावा)

आमेर के राजा भीम के वंशज, (उनके पुत्र आसकरण को अकबर बादशाह द्वारा नरवर की जागीर प्रदान की गई थी)।

 

पिच्यानोत 

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "पंचायण " के वंशज। बारह कोटड़ियोंमें से एक, ठिकाना सामरिया। 

 

खंगारोत 

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र जगमल के पुत्र, राव "खंगार" के वंशज। बारह कोटड़ियों में से एक,  ठिकाने - डिग्गी, जोबनेर, नरेना, दूदू। 

 

रामचंद्रोत

जगमाल के पुत्र "रामचंद्र" के वंशज। रामचंद्र राजा भगवंत दास के साथ कश्मीर गए और वहीं बस गए। उन्हें वहां डोगरा कहा जाता था।

 

सुरतानोत 

राजा पृथ्वीराज के पुत्र "सुरतान" के वंशज। बारह कोटड़ियोंमें से एक ठिकाना सुरोठ।

 

चतुर्भुजोत

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "चतुर्भुज" के वंशज। बारह कोटड़ियोंमें से एक ठिकाना बगरू ।

 

बलभद्रोत

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "बलभद्र" के वंशज। बारह कोटड़ियोंमें से एक, ठिकाना अचरोल ।

 

प्रतापपोता 

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "प्रताप" के वंशज।

 

रामसिंहोत  

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "रामसिंह" के वंशज।

 

भीकावत 

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "भीका" के वंशज।

 

नाथावत

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पोते और गोपाल के पुत्र  "नाथा " के वंशज। बारह कोटड़ियों में से एक, ठिकाना चोमू, सामोद ।

 

बाघावत

गोपाल के पुत्र और आमेर के राजा पृथ्वीराज के पोते "बाघ" के वंशज,।

 

देवकर्णोत 

गोपाल के पुत्र और आमेर के राजा पृथ्वीराज के पोते "देवकरण" के वंशज।

 

किल्याणोत

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "कल्याण" के वंशज। बारह कोटड़ियों में से एक, ठिकाना पदमपुरा , लोटवाड़ा और कालवाड़।

 

साईंदासोत

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र साईंदास" के वंशज।

 

रूपसिंहोत 

आमेर के राजा पृथ्वीराज के पुत्र "रूप सिंह" के वंशज।

 

पूरनमलोत

आमेर के राजा "पुरनमल" के वंशज। बारह कोटड़ियों में से एक, पूरणमल को निमेरा की जागीर मिली थी।

 

बांकावत

आमेर के राजा भारमल के पुत्र और राजा भगवंत दास के छोटे भाई "भगवान दास" के वंशज, जिन्हें लॉन की जागीर मिली। यह भी कहा जाता है कि मुगल शासक द्वारा युद्ध में वीरता के प्रदर्शन के लिए एक मान्यता के रूप में "बांके राजा" की उपाधि दी गई थी।

 

राजावत

आमेर के राजा भगवंत दास के वंशज। अन्य कई भी राजावत को उपनाम के रूप में उपयोग करते हैं। कीर्तिसिंहोत, दुर्जनसिंहोत, जुझारसिंहोत आदि इनके उप खाप हैं।

 

जगन्नाथोत 

आमेर के राजा भारमल के पुत्र "जगन्नाथ" के वंशज।

 

सल्हेदीपोता 

आमेर के राजा भारमल के पुत्र "सलहेदी " के वंशज।

 

सादूलपोता 

आमेर के राजा भारमल के पुत्र "सारदूल" के वंशज।

 

सुंदरदासोत

आमेर के राजा भारमल के पुत्र "सुंदरदास" के वंशज

सोमवार, 19 मई 2025

शास्त्रार्थ

बिहार के सारण जिला मे उस समय के "मंटापोखर-टेपहां" गांव मे 8 जुलाई 1933 ई को पंडित जेपी चौधरी जी(कुशवाहा) और ब्रह्मचारी पंडित विद्याभानु शास्त्री के साथ #शास्त्रार्थ हुआ था।

विद्याभानु शास्त्री का पक्ष था कि कोयरी जाति के अंदर आने वाले #जरूहार (जलुहार कोयरी) शाखावाले 'यजुर्हार ब्राह्मण' हैं तथा #कुशवाहा_क्षत्रिय होने पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया। 

इसपर पंडित जेपी चौधरी जी ने 'कुश' के अस्तित्व तथा कोयरियों के कुशवाहा क्षत्रिय होने के अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किए। अंत मे इस शास्त्रार्थ मे जेपी चौधरी जी #विजयी हुए और विद्याभानु शास्त्री की घोर पराजय हुई। 

इस शास्त्रार्थ का पूर्ण विवरण 22 जुलाई 1933 ई. को पत्रिका 'कुशवाहा क्षत्रिय मित्र' मे पृष्ठ संख्या-10 से 12 तक प्रकाशित हुआ था।

#kushlekh
#aiku

सोमवार, 6 जनवरी 2025

जेपी चौधरी:आधुनिक कुशवाहा समाज का पिता

जेपी चौधरी:आधुनिक कुशवाहा समाज का पिता
कुशवाहा समाज का एकीकरण करने का प्रथम प्रयास 1891 में मंवंत कोइरी जी ने किया था,मंवंत कोइरी जी मूल रूप से बंगाल के निवासी थे,जिनका कार्यक्षेत्र बिहार तथा बंगाल का क्षेत्र बना,कालान्तर में इस एकीकरण को आगे बढ़ाने का प्रयास पंडित जेपी चौधरी (कुशवाहा)  जिनको आधुनिक कुशवाहा समाज का पिता कहा जा सकता हे।उनके पहल से राजा माता प्रसाद वर्मा जी, चुनार के राजा अर्जुनदेव जी तथा हरि प्रसाद वैष्णव जी आदि के सहयोग से 1912 में मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय कुशवाहा क्षत्रिय महासभा का स्थापना हुआ, बिहार में जितने भी कुश वंशियों को  एकत्रित  किया गया, सभी को कुशवाहा जाति में मिला लिया गया,उसी समय कुर्मी तथा यादव में भी चेतना का विकास हो रहा था। कुशवंशियों में दांगी गोत्र वाले अपने को कुशवाहा जाति के शेष गोत्र वाले लोगों से अपने को श्रेष्ठ समझते थे। आज भी वे लोग अपने को श्रेष्ठ ही तथा कुशवंशियों से अलग समझते हैं। उन्हीं दांगी लोगों में जगदेव दांगी एक प्रसिद्ध तथाकथित समाज सुधारक हुआ, जिसने अपने गोत्र के लोगों को शेष कुशवाहा लोगों से तो अलग रखा, लेकिन अपना राजनीति चमकाने के लिए कुशवाहा समाज का नेता बना। कुशवाहा जाति के एकीकरण का इन्हीं दागियों का एक गुट विरोध कर रहा था, लेकिन उस समय राजा माता प्रसाद वर्मा जी, राजा अर्जुनदेव जी तथा जयपुर राजघराना के समर्थन होने के कारण दांगी लोगों का एक भी नहीं चला।वैसे अंग्रेजो के आने से पहले बिहार के जमींदार तो कुशवाहा ही तथा एक नंबर विकसित जाति थे।
    जगदेव नामक एक दांगी जो ठान ही लिया था कुशवाहा को कमजोर करके ही दांगी को मजबूत किया जा सकता है, उसने एक बात का खूब प्रचार करवाया की दांगी सभी कुशवाहा से उपर है।ये जगदेव दांगी का ही प्रचार किया हुआ है।फिर जगदेव ने बडकी दांगी और छोटकी दांगी के बीच विभाजन करवाया,अब हर जगह ये कुशवाहा समाज को भ्रमित करने लगा। जब कुशवाहा समाज के लोग विकास कर रहे थे तथा शिक्षित बन रहे थे,तो जगदेव दांगी ने कुशवाहा समाज को माओ का शिक्षा देने लगा, किताब के बजाय उसने बन्दुक पर जोड देने लगा,धीरे धीरे कुशवाहा समाज में इसने नकारात्मकता का भाव भर दिया।अखिल भारतीय कुशवाहा क्षत्रिय महासभा से इसने क्षत्रिय शब्द हटवाया, जिससे इसे अनुसूचित जाति को बग़ल में बैठा सके, जगदेव ने अपने गोत्र वालों के लिए दांगी क्षत्रिय महासभा बनाया।खुद में क्षत्रिय शब्द लगवाया तथा शेष कुशवाहा लोगों में क्षत्रिय शब्द को हटवा दिया,1964 में कुछ दिनों के लिए  कुशवाहा समाज से बिहार के मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह बने, इन सतीश जी को मुख्यमंत्री के पद से हटवाने में जगदेव दांगी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसीलिए हमारे समाज के आदर्श जेपी चौधरी जी है,न कि जगदेव दांगी। कुछ दिनों बाद उसने माली,फूले,ज्योतिराव फूले, ज्योतोबाबाई फूले ये नया बवाल चालू कर दिया, जिनका कुशवाहा समाज का कोई संबंध नहीं है।